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लोककला के एक युग का अंत: पद्म विभूषण तीजन बाई का निधन, कला जगत में गहरी शोक की लहर |

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विशेष रिपोर्ट: दिलीप कुमार (जौनपुर) | तृप्ति प्रणाम

पंचतत्व में विलीन हुईं पंडवानी की अमर स्वर साधिका जौनपुर। छत्तीसगढ़ की विश्व प्रसिद्ध पंडवानी गायिका और भारत की सांस्कृतिक राजदूत, पद्म विभूषण से सम्मानित तीजन बाई का 5 जुलाई 2026 को 70 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके अवसान की खबर मिलते ही देशभर के कला, साहित्य, रंगमंच और संस्कृति जगत में गहरी शोक की लहर दौड़ गई है। देश ने आज अपनी लोक परंपरा को विश्व पटल पर स्थापित करने वाली एक महान साधिका को खो दिया है।

वैश्विक मंच पर पंडवानी को दिलाई अमूल्य पहचान 24 अप्रैल 1956 को जन्मी तीजन बाई ने पारंपरिक बंधनों को तोड़कर लोककला के क्षेत्र में अपनी एक अमिट पहचान बनाई। उन्होंने अपनी अद्वितीय और दमदार आवाज, चेहरे के विस्मित कर देने वाले अभिनय भावों और पंडवानी की ‘कापालिक शैली’ के माध्यम से महाभारत के प्रसंगों को जीवंत किया। तीजन बाई ने न केवल देश के भीतर बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय लोक कला की सुवास बिखेरी, जिससे विदेशी दर्शक भी उनके गायन के मुरीद हो गए।

राष्ट्रीय सम्मानों से सुशोभित जीवन-यात्रा तीजन बाई की इस अनन्य कला साधना और भारतीय संस्कृति के प्रति उनके अमूल्य योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें समय-समय पर देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से अलंकृत किया। उन्हें साल 1988 में पद्म श्री, साल 2003 में पद्म भूषण और वर्ष 2019 में देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्म विभूषण’ से नवाजा गया था। यह सम्मान उनके कड़े संघर्ष और अद्वितीय हुनर का प्रमाण थे।

साहित्यकारों और कला प्रेमियों ने व्यक्त किया शोक उनके निधन पर देश के विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक संगठनों ने गहरा दुख प्रकट करते हुए उन्हें अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की है। बनारस लिट फेस्ट (काशी साहित्य कला उत्सव) के वरिष्ठ साहित्यकार लोलार्क दुबे ने शोक व्यक्त करते हुए कहा, “पद्म विभूषण तीजन बाई की जीवन-यात्रा हर किसी के लिए प्रेरणा है। उनका जीवन यह सिखाता है कि यदि हमारा लक्ष्य स्पष्ट हो, उसे पाने का अटूट जुनून हो और बाधाओं से टकराने का साहस हो, तो कोई भी मंजिल असंभव नहीं रहती। उनका संघर्ष और साधना आने वाली कई पीढ़ियों का मार्ग प्रशस्त करेगी।”

लोलार्क दुबे ने तीजन बाई के जौनपुर दौरे के संस्मरण को साझा करते हुए कहा कि वे जब जौनपुर आई थीं, तब उनकी पंडवानी प्रस्तुति ने उपस्थित जनसमुदाय को पूरी तरह रसविभोर और मंत्रमुग्ध कर दिया था। वह ऐतिहासिक शाम आज भी जौनपुर के कला प्रेमियों के दिलों में पूरी तरह जीवंत है।

एक अमूल्य विरासत छोड़ गईं तीजन बाई तीजन बाई का संपूर्ण जीवन भारतीय लोक संस्कृति की एक ऐसी अमूल्य धरोहर है, जिसे कभी विस्मृत नहीं किया जा सकता। उनकी कला, सादगी, अद्भुत अभिनय क्षमता और लोक संस्कृति के प्रति समर्पण सदैव अमर रहेगा। लोककला की इस महान और जाज्वल्यमान विभूति को कोटि-कोटि नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि।

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Rajesh