लेखक: मीना अग्रवाल, नेचुरोपैथिस्ट, आगरा
गिलोय (टिनोस्पोरा कॉर्डिफोलिया) आयुर्वेद में प्राचीन काल से प्रयुक्त होने वाली एक महत्वपूर्ण जड़ी-बूटी है। वर्तमान शोधों के अनुसार, यह मधुमेह प्रबंधन में सहायक भूमिका निभा सकती है, हालांकि यह रोग का प्रतिस्थापन उपचार नहीं है।
प्रमुख स्वास्थ्य लाभ
- रक्त शर्करा नियंत्रण: गिलोय में मौजूद जड़ी-बूटी यौगिक इंसुलिन संवेदनशीलता में सुधार कर सकते हैं और ग्लूकोज मेटाबॉलिज्म को संतुलित रखने में सहायता प्रदान करते हैं।
- प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूती: इसमें उपस्थित एंटीऑक्सीडेंट गुण ऑक्सीडेटिव तनाव को कम करते हैं तथा श्वेत रक्त कोशिकाओं की गतिविधि को बढ़ावा देते हैं, जो मधुमेह रोगियों के लिए विशेष रूप से लाभदायक है।
- सूजन कम करना: एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण शरीर की दीर्घकालिक सूजन को नियंत्रित करने में सहायक हैं, जो मधुमेह से जुड़ी जटिलताओं के जोखिम को कम कर सकते हैं।
- उपापचय सुधार: गिलोय पाचन तंत्र को स्वस्थ रखने और पोषक तत्व अवशोषण में सुधार करने में सहायता प्रदान करता है।
सेवन विधि
- रस: सुबह खाली पेट 10-15 मिलीलीटर गिलोय रस का सेवन।
- काढ़ा: गिलोय की डंडी को पानी में उबालकर 20-30 मिलीलीटर काढ़ा तैयार कर सकते हैं।
- चूर्ण: आयुर्वेदिक विशेषज्ञ की सलाह से 1-3 ग्राम चूर्ण का सेवन।
आवश्यक सावधानियाँ
- मधुमेह की दवाएँ लेने वाले रोगियों को गिलोय का सेवन आरंभ करने से पूर्व चिकित्सक से परामर्श अनिवार्य है, क्योंकि यह रक्त शर्करा को अत्यधिक कम कर सकता है।
- गर्भावस्था एवं स्तनपान काल में बिना चिकित्सकीय सलाह के सेवन न करें।
- केवल प्रमाणित एवं मिलावट रहित उत्पादों का ही उपयोग करें।
- नियमित रूप से रक्त शर्करा स्तर की जांच करवाते रहें।
महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण
गिलोय मधुमेह का उपचार नहीं, बल्कि एक सहायक पूरक उपाय है। मधुमेह प्रबंधन के लिए नियमित दवा, संतुलित आहार, शारीरिक गतिविधि और चिकित्सक की निगरानी आवश्यक है।
स्वास्थ्य ही सच्चा धन है।