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श्वास रोगों में विभीतकी (बहेड़ा): आयुर्वेद की वह औषधि जिसके सामने हैं सभी दवाएँ पीछे |

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आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथ अष्टांग हृदय, चिकित्सा स्थान, अध्याय 3, श्लोक 172 में आचार्य वाग्भट ने श्वास और कास रोगों के संदर्भ में एक स्पष्ट कथन दिया है: “सर्वेषु श्वासकासेषु केवलं विभीतकी”। इसका अर्थ है कि श्वास एवं कास की समस्त विकृतियों में विभीतकी (बहेड़ा) विशेष रूप से उपयोगी मानी जाती है।

विभीतकी कौन सी औषधि है?

विभीतकी, जिसे सामान्य भाषा में बहेड़ा कहते हैं, त्रिफला का एक प्रमुख घटक है। इसका वैज्ञानिक नाम Terminalia bellirica है। श्वास, कास तथा श्वसन तंत्र संबंधी विकारों में इसकी विशेष भूमिका आयुर्वेदिक साहित्य में वर्णित है।

किन स्थितियों में उपयोगी मानी जाती है?

आयुर्वेदिक विचारधारा के अनुसार, विभीतकी का उपयोग निम्नलिखित स्थितियों में लाभदायक माना जाता है:

  • सांस फूलना या श्वास कठिनाई
  • सूखी अथवा कफ युक्त खांसी
  • गले में खराश या भारीपन का अनुभव
  • बार-बार कफ का जमाव
  • ब्रोंकाइटिस जैसी स्थितियाँ
  • धूम्रपान के कारण होने वाली श्वसन संबंधी समस्याएँ
  • निमोनिया या तपेदिक के बाद फेफड़ों का कमजोर होना
  • रात्रि में कफ का अधिक जमाव तथा प्रातःकाल गले में भारीपन

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण: श्वास रोग की उत्पत्ति

आयुर्वेद के अनुसार, श्वास रोगों की उत्पत्ति सीधे फेफड़ों से नहीं, बल्कि पाचन तंत्र की असंतुलित अवस्था से होती है। जब आमाशय में अग्नि (पाचन शक्ति) कमजोर होती है, तो रस धातु का निर्माण प्रभावित होता है। इसके परिणामस्वरूप अत्यधिक कफ (रस धातु का मल) उत्पन्न होता है, जो शरीर में ऊपर की ओर बढ़कर छाती और फेफड़ों में जमा हो जाता है। अतः पाचन तंत्र को संतुलित करना श्वास रोगों के प्रबंधन का मूल आधार है।

विभीतकी के गुण और क्रियाविधि

विभीतकी के निम्नलिखित गुण इसे श्वसन तंत्र के लिए विशेष रूप से उपयोगी बनाते हैं:

  • लघु गुण: हल्कापन, जो कफ को तोड़ने में सहायक
  • रूक्ष गुण: अतिरिक्त चिकनाहट और श्लेष्म को कम करना
  • उष्ण वीर्य: वात और कफ दोष को शांत करने वाली प्रकृति
  • मधुर विपाक: पाचन के बाद शरीर में संतुलन स्थापित करना

यह औषधि रस, रक्त, मांस और मेद धातुओं पर प्रभाव डालती है। चूँकि फेफड़ों (फुफ्फुस) की उत्पत्ति रक्त धातु से मानी गई है, अतः विभीतकी द्वारा रक्त धातु का शोधन सीधे फेफड़ों की कार्यक्षमता को सुधारने में सहायक होता है।

उपयोग विधि

  1. गुड़ के साथ: बहेड़ा चूर्ण एक चुटकी तथा पुराने देसी गुड़ की समान मात्रा को मिलाकर चने के दाने के आकार की गोली बनाएँ। दिन में 4-5 बार, भोजन के बाद धीरे-धीरे चूसकर घुलने दें। इसे एक साथ निगलना नहीं चाहिए।
  2. गुनगुने जल के साथ: आधा चम्मच बहेड़ा चूर्ण को रात्रि में सोने से पूर्व हल्के गुनगुने जल के साथ सेवन करें। यह विधि उन व्यक्तियों के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है जिन्हें रात्रि में गले का भारीपन या श्वास कठिनाई का अनुभव होता है।

महत्वपूर्ण सावधानी

यह जानकारी केवल शैक्षिक और सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रदान की गई है। किसी भी आयुर्वेदिक औषधि का सेवन करने से पूर्व योग्य आयुर्वेद चिकित्सक या स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें। व्यक्तिगत स्वास्थ्य स्थिति, आयु, दोष प्रकृति और सहचर रोगों के आधार पर मात्रा एवं उपयोग विधि में अंतर हो सकता है। गंभीर श्वसन संबंधी रोगों में आधुनिक चिकित्सा के साथ समन्वय आवश्यक है।

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Rajesh