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पित्ताशय: शरीर का अनमोल पाचन सहायक | डॉ. मीना अग्रवाल, नेचुरोपैथ|

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पित्ताशय: शरीर का अनमोल पाचन सहायक
डॉ. मीना अग्रवाल, नेचुरोपैथ, आगरा
मानव शरीर में कई ऐसे अंग हैं जो पाचक रसों, हार्मोन्स या अन्य जैविक द्रव्यों को संग्रहित करते हैं। इन्हें ‘थैलीनुमा अंग’ (Hollow Organs) कहा जाता है। आमाशय, मूत्राशय और पित्ताशय इसी श्रेणी के अंग हैं।
पित्ताशय यकृत (लीवर) के दाहिने भाग के नीचे स्थित एक नाशपाती के आकार की थैलीनुमा संरचना है, जो लगभग चार इंच लंबी और दो इंच व्यास वाली होती है। यह प्रतिदिन 30 से 50 मिलीलीटर पित्त रस (Bile) को संग्रहित करती है। पित्त रस का निर्माण शरीर के सबसे बड़े अंग यकृत द्वारा किया जाता है, जो प्रतिदिन 500 से 1000 मिलीलीटर पित्त का उत्पादन करता है। यह क्षारीय, हरे-पीले रंग का द्रव वसा के पाचन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
भोजन के रूप में ली गई वसा जब छोटी आंत में पहुँचती है, तो आंत की भित्ति से स्रावित होने वाला हार्मोन पित्ताशय को सक्रिय करता है। पित्ताशय आवश्यक मात्रा में सांद्रित पित्त रस को पित्त वाहिनी द्वारा छोटी आंत में मुक्त करता है, जिससे वसा का पाचन संभव होता है। यह प्रक्रिया शरीर की एक सुव्यवस्थित पाचन प्रणाली का उदाहरण है।
चिकित्सकों के अनुसार, पित्ताशय में पथरी (Gallstones) का निर्माण अनियमित आहार, अत्यधिक वसायुक्त भोजन, तेज वजन घटाने या आनुवंशिक कारकों से हो सकता है। अधिकांश मामलों में पथरी लक्षणहीन रहती है, किंतु कुछ व्यक्तियों में दर्द या असुविधा हो सकती है। गंभीर स्थितियों में चिकित्सक पित्ताशय उच्छेदन (Cholecystectomy) सर्जरी की सलाह दे सकते हैं।
सर्जरी के बाद यकृत द्वारा निर्मित पित्त रस सीधे आंत में प्रवाहित होता है। चिकित्सा साहित्य के अनुसार, अधिकांश रोगी सर्जरी के पश्चात् सामान्य जीवन जीते हैं, हालाँकि कुछ व्यक्तियों में पाचन संबंधी अस्थायी असुविधाएँ हो सकती हैं। इसलिए आहार और जीवनशैली में सावधानी बरतना आवश्यक है।
आयुर्वेद में पित्ताशय स्वास्थ्य हेतु पित्त पापड़ा, कासनी जैसी जड़ी-बूटियों का उल्लेख मिलता है। तथापि, किसी भी उपचार को चिकित्सकीय परामर्श के बिना अपनाने से पूर्व सावधानी बरतनी चाहिए। आधुनिक चिकित्सा और पारंपरिक पद्धतियों के समन्वय से बेहतर स्वास्थ्य परिणाम प्राप्त हो सकते हैं।
शरीर का प्रत्येक अंग भगवान की रचना का अनूठा उदाहरण है। स्वास्थ्य की रक्षा हेतु संतुलित आहार, नियमित जीवनशैली और चिकित्सकीय मार्गदर्शन का सही संयोजन ही सर्वोत्तम समाधान है।
— डॉ. मीना अग्रवाल, नेचुरोपैथ, आगरा

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Rajesh