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ईरान-अमेरिका युद्धविराम में पाकिस्तान की भूमिका और भारत की कूटनीतिक अनुपस्थिति पर चिंता व्यक्त |

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दिनांक: 8 अप्रैल 2026
ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच घोषित दो सप्ताह के युद्धविराम समझौते में पाकिस्तान की सक्रिय मध्यस्थता भूमिका और इस महत्वपूर्ण वैश्विक घटनाक्रम से भारत की पूर्ण अनुपस्थिति ने देश की विदेश नीति विशेषज्ञों और रणनीतिक विश्लेषकों में गहरी चिंता उत्पन्न की है।
प्रमुख बिंदु:
पाकिस्तान की कूटनीतिक सफलता: आर्थिक संकट और अंतरराष्ट्रीय दबावों का सामना कर रहा पाकिस्तान आज वैश्विक शांति वार्ता में प्रमुख भूमिका निभा रहा है।
भारत की रणनीतिक विफलता: पारंपरिक रूप से गुटनिरपेक्ष नीति और नैतिक नेतृत्व का दावा करने वाला भारत इस ऐतिहासिक क्षण से पूरी तरह गायब रहा।
अमेरिका-इजरायल झुकाव: प्रधानमंत्री मोदी की सरकार की स्पष्ट प्रो-अमेरिका और प्रो-इजरायल नीतियों के कारण भारत ने अपनी स्वतंत्र विदेश नीति की छवि खो दी है।
नैतिक साहस का अभाव: अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा ईरान को परमाणु हमले की धमकी की निंदा करने में भारत की विफलता चिंताजनक है।


क्षेत्रीय प्रभाव: भारत की यह कूटनीतिक अनुपस्थिति दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व में उसकी रणनीतिक स्थिति को कमजोर कर सकती है।
विशेषज्ञ राय:
वरिष्ठ विदेश नीति विश्लेषकों का मानना है कि भारत को अपनी विदेश नीति में तत्काल पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता है। राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हुए संतुलित और स्वतंत्र दृष्टिकोण अपनाना समय की मांग है।
आगे की कार्यवाही:
इस मुद्दे पर संसद में चर्चा की मांग की जा रही है। विदेश मंत्रालय से स्पष्टीकरण की अपेक्षा है कि भारत ने इस महत्वपूर्ण वैश्विक घटनाक्रम में क्यों भाग नहीं लिया और भविष्य में ऐसी स्थितियों से निपटने की क्या रणनीति है।

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Rajesh