आगरा, 26 दिसंबर 2025:
नेचुरोपैथी विशेषज्ञ डॉ. मीना अग्रवाल ने आज यहाँ बताया कि आधुनिक युग में अधिकांश शारीरिक व मानसिक रोगों का मूल कारण चिंता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य का मन और शरीर एक दूसरे से गहराई से जुड़े हैं, और मन में उठने वाली चिंताएँ धीरे-धीरे शारीरिक रोगों का रूप ले लेती हैं।
डॉ. अग्रवाल ने स्पष्ट किया कि चिंता केवल एक सामान्य भावना नहीं है, बल्कि यह शरीर की सम्पूर्ण प्रणाली को असंतुलित कर देने वाली मानसिक अवस्था है। भविष्य की काल्पनिक आशंकाओं में फँसा मन निरंतर तनाव की स्थिति में रहता है, जिससे शरीर में स्ट्रेस हार्मोन्स का स्राव बढ़ जाता है। लंबे समय तक इसके सक्रिय रहने से पाचन, नींद, हार्मोन संतुलन और प्रतिरक्षा प्रणाली सभी प्रभावित होते हैं।
उन्होंने आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से बताया कि चिंता वात दोष को अत्यधिक बढ़ाती है, जिसके कारण शरीर में अनियमितता आ जाती है। गैस, कब्ज, सिरदर्द, जोड़ों का दर्द, हृदयगति में तेज़ी, अनिद्रा और हाथ-पैरों में कांपन जैसे लक्षण वात विकार के ही परिणाम हैं।
डॉ. अग्रवाल ने बताया कि चिंता का सबसे प्रारंभिक प्रभाव पाचन तंत्र पर पड़ता है। यह भूख को अनियमित कर देती है, जिससे पाचन अग्नि कमजोर हो जाती है। दुर्बल पाचन से आम दोष (विषैले तत्व) बनने लगते हैं, जो मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा, त्वचा रोग और जोड़ों की समस्याओं का कारण बनते हैं।
हृदय रोगों के मामले में भी चिंता एक प्रमुख कारक है। निरंतर तनाव से रक्तचाप बढ़ता है और हृदय पर अत्यधिक दबाव पड़ता है, जो समय के साथ हार्ट अटैक या स्ट्रोक का कारण बन सकता है। उन्होंने ध्यान दिलाया कि कई बार व्यक्ति स्वस्थ आहार एवं व्यायाम करते हुए भी रोगग्रस्त हो जाता है, क्योंकि उसका मन निरंतर चिंता में डूबा रहता है।
महिलाओं में चिंता हार्मोनल असंतुलन, PCOD, थायरॉइड और मासिक धर्म की अनियमितता का कारण बनती है, जबकि पुरुषों में यह यौन कमजोरी, थकान और क्रोध जैसी समस्याएँ पैदा करती है। बच्चों में यह पढ़ाई में मन न लगने, आत्मविश्वास की कमी और अत्यधिक डर के रूप में प्रकट होती है।
डॉ. अग्रवाल ने चेतावनी दी कि चिंता को अक्सर लोग “जीवन का सामान्य हिस्सा” समझ लेते हैं, जबकि यह वर्षों में जीवन की गुणवत्ता को धीरे-धीरे नष्ट कर देती है। रोग स्पष्ट होने तक शरीर पहले से कमजोर हो चुका होता है।
मुक्ति का मार्ग उन्होंने आंतरिक शांति में बताया। वर्तमान क्षण में जीना, अनिश्चितता को स्वीकार करना, समय पर भोजन, पर्याप्त नींद और प्रकृति के साथ संपर्क बनाए रखना – ये नेचुरोपैथी के मूल सिद्धांत हैं। उन्होंने कहा, “जब मन शांत होगा, तभी शरीर स्वस्थ रह सकेगा।”
अंत में डॉ. मीना अग्रवाल ने स्पष्ट किया कि “चिंता रोग का मूल कारण है और शांति ही सच्ची औषधि है।”