आगरा: अनिद्रा अर्थात् नींद न आने की समस्या वर्तमान समय की एक सामान्य स्वास्थ्य चुनौती बन गई है। यह तंत्रिका तंत्र से संबंधित विकार है जिसमें व्यक्ति को आवश्यकतानुसार पर्याप्त नींद नहीं आती। सामान्यतः प्रतिदिन 6 से 8 घंटे की गहरी नींद शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक मानी जाती है। नींद के दौरान ही तनावग्रस्त पेशियों व तंत्रिकाओं को पुनर्स्थापना का अवसर मिलता है।
डॉ. मीना अग्रवाल, नेचुरोपैथी विशेषज्ञ आगरा के अनुसार, अनिद्रा रोग के प्रमुख लक्षणों में निम्नलिखित शामिल हैं:
- रात्रि में नींद का अभाव या अत्यंत कम समय तक नींद आना
- बार-बार जागना तथा पुनः नींद न आना
- शारीरिक थकान एवं कार्यक्षमता में कमी
- स्मरण शक्ति का कमजोर होना
- रक्तचाप में वृद्धि
- चेहरे की प्राकृतिक चमक का कम होना
- आंखों में भारीपन तथा चिड़चिड़ापन
अनिद्रा के प्रमुख कारण:
- मानसिक तनाव एवं अत्यधिक चिंता
- दैनिक जीवन में शारीरिक श्रम का अभाव
- रात्रि में अधिक भोजन या भूखे पेट सोना
- चाय, कॉफी या उत्तेजक पदार्थों का अधिक सेवन
- कब्ज या पाचन तंत्र की समस्याएँ
- शरीर में रक्त की कमी या दुर्बलता
- धूम्रपान एवं अनियमित जीवनशैली
- सोने के वातावरण में असुविधा—अधिक प्रकाश, शोर या अस्वच्छता
प्राकृतिक चिकित्सा आधारित उपचार विधियाँ:
डॉ. अग्रवाल के अनुसार, अनिद्रा के प्रबंधन हेतु निम्नलिखित प्राकृतिक उपाय लाभदायक हैं:
- आहार व्यवस्था: लौकी का रायता, दही में शहद-सौंफ-काली मिर्च मिलाकर सेवन, सुबह-शाम शहद मिला जल पीना। मसालेदार व अत्यधिक तले-भुने व्यंजनों से बचाव।
- योग एवं प्राणायाम: सूर्य नमस्कार, वज्रासन, शवासन, सर्वांगासन तथा शीतली प्राणायाम का नियमित अभ्यास।
- जल चिकित्सा: सुबह नंगे पैर घास पर चलना, कटि स्नान, मेह स्नान तथा सप्ताह में एक बार गीली चादर लपेटना।
- सोने से पूर्व उपाय: गर्म पानी से पैर धोना (गर्मपाद स्नान), पैरों के तलवों पर सरसों के तेल की मालिश, सिर पर सूर्यतप्त नीले तेल का लेप।
- निद्रा योग: सोने से पूर्व शवासन, उल्टी गिनती या योगनिद्रा का अभ्यास। बाईं करवट सोना तथा उत्तर दिशा में सिर रखकर न सोना।
डॉ. अग्रवाल ने बताया कि गहरी नींद की गुणवत्ता अवधि से अधिक महत्वपूर्ण है। तीन घंटे की गहरी नींद आठ घंटे की उथली व स्वप्नों से भरी नींद से अधिक लाभकारी होती है। नींद की गुणवत्ता सुधारने के लिए चिंता-मुक्त मन, नियमित दिनचर्या एवं प्राकृतिक उपचार विधियों का समन्वय आवश्यक है।
स्वास्थ्य ही सम्पदा है
— डॉ. मीना अग्रवाल, नेचुरोपैथी विशेषज्ञ, आगरा