चेन्नई। बिहार के नरौली गांव की एक मां वर्षों से एक अनसुलझे सवाल के साथ जी रही थी—उसका छोटा बेटा आखिर कहां है? करीब 11 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद 2026 में इस सवाल का जवाब मिलने की शुरुआत हुई, जब हजारों किलोमीटर दूर सड़कों पर मानसिक रूप से परेशान हालत में घूम रहे एक व्यक्ति को समाजसेवियों ने बचाया। यह व्यक्ति मुमताज़ मोहम्मद था।
25 सितंबर 2026 को समाजसेवक मिस्टर जैकब और मिस्टर अन्नामलाई ने मुमताज़ को सड़क से सुरक्षित बचाया। कोयम्बेडु पुलिस स्टेशन से पुलिस मेमो प्राप्त होने के बाद उसे ‘उदवुम करंगल’ संस्था में लाया गया।
संस्था में मुमताज़ को सुरक्षित रहने की जगह, पौष्टिक भोजन, चिकित्सा देखभाल और सबसे बढ़कर धैर्य एवं अपनापन दिया गया। एक मनोचिकित्सक ने उसकी जांच की और नियमित रूप से मनोरोग संबंधी दवाएं शुरू की गईं।
धीरे-धीरे उसकी स्थिति में सुधार होने लगा। इलाज और देखभाल के साथ उसकी याददाश्त और अपने अतीत के बारे में बात करने की क्षमता वापस आने लगी। उसने बिहार में अपने परिवार से जुड़ी जानकारी साझा की। यही जानकारी उसे उसके घर तक पहुंचाने का माध्यम बनी।
मस्जिद की मदद से बिहार में मिला परिवार
‘उदवुम करंगल’ की टीम ने पास के गांव की सिवन्ना डुमरी मस्जिद से संपर्क किया। मस्जिद की मदद से मुमताज़ के परिवार का पता बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर जिले के नरौली गांव में लगाया गया।
इसके बाद उसकी मां और भाई से संपर्क किया गया। परिवार ने बताया कि मुमताज़ 2015 में कोलकाता से लापता हो गया था। उस समय वह चमड़े के बैग बनाने वाली एक कंपनी में काम करता था।
मुमताज़ के लापता होने के बाद परिवार को वर्षों तक उसकी कोई पक्की जानकारी नहीं मिल सकी। उन्हें यह भी पता नहीं था कि वह कहां है और उसके साथ क्या हुआ।
4 अक्टूबर को परिवार से हुआ मिलन
लंबे इंतजार के बाद 4 अक्टूबर 2026 को आखिरकार वह भावुक पल आया, जब ‘उदवुम करंगल’ के शांतिवनम में मुमताज़ को उसके बड़े भाई मोहम्मद इम्तियाज़ अंसारी को सौंपा गया।
संस्था के संस्थापक सचिव एस. विद्याकर ने मुमताज़ को उसके भाई के सुपुर्द किया। यह केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि वर्षों से परिवार से बिछड़े एक बेटे और छोटे भाई की घर वापसी थी।
परिवार के रवाना होने से पहले ‘उदवुम करंगल’ की ओर से मुमताज़ को एक महीने की मनोरोग संबंधी दवाएं दी गईं। उसके भाई को सलाह दी गई कि डॉक्टर की सलाह के अनुसार दवाएं नियमित रूप से जारी रखी जाएं।
अब नरौली गांव में उसकी मां अपने उस छोटे बेटे का इंतजार कर रही है, जिसके लौटने की उम्मीद ने वर्षों तक परिवार का साथ नहीं छोड़ा।
मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशीलता का संदेश
मुमताज़ की कहानी मानसिक स्वास्थ्य से जूझ रहे लोगों के प्रति संवेदनशीलता का महत्वपूर्ण संदेश देती है। ‘उदवुम करंगल’ का कहना है कि मानसिक परेशानी से जूझ रहा व्यक्ति केवल एक मरीज या सड़क पर घूमता हुआ अजनबी नहीं होता। वह किसी का बेटा, बेटी, भाई, बहन, माता-पिता या दोस्त होता है।
सम्मान, इलाज, भोजन, सुरक्षित रहने की जगह, धैर्य और हमदर्दी के जरिए कई लोगों को उनकी पहचान और परिवार से दोबारा जोड़ा जा सकता है।
1983 में शुरू हुई ‘उदवुम करंगल’ संस्था चार दशकों से अधिक समय से बेसहारा, जरूरतमंद और मानसिक रूप से परेशान लोगों की सेवा कर रही है। संस्था का कार्य बचाव, पुनर्वास और बहाली पर आधारित है। इसका उद्देश्य जरूरतमंद लोगों को केवल रहने की जगह उपलब्ध कराना ही नहीं, बल्कि उन्हें स्वस्थ होने और जहां संभव हो, उनके परिवारों से दोबारा जोड़ने का अवसर देना भी है।
मुमताज़ का सफर इस बात की याद दिलाता है कि किसी परेशान व्यक्ति के लिए रुकना, उसकी मदद करना और उसे भुलाए नहीं जाने देना कभी-कभी उसकी पूरी जिंदगी बदल सकता है।
रिपोर्ट: तृप्ति प्रमाण




