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शंख प्रक्षालन: पाचन तंत्र की प्राकृतिक सफाई की नेचुरोपैथिक विधि |

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आगरा नेचुरोपैथिक निवासी मीना अग्रवाल ने शंख प्रक्षालन क्रिया के सही अनुष्ठान विधि के बारे में विस्तृत जानकारी साझा की है। यह प्राकृतिक प्रक्रिया आंत्रिक सफाई के लिए योग एवं नेचुरोपैथी में प्रचलित है।
प्रक्रिया के अनुसार, सर्वप्रथम नमक मिले गुनगुने पानी को तैयार कर लें जिसे आसानी से पीया जा सके। कागासन में विराजमान होकर दो गिलास पानी का सेवन करें। तत्पश्चात् क्रमशः चार बार तक्यासन, उर्ध्व हस्तोत्तानासन, कटि चक्रासन तथा उदराकर्षणासन का अभ्यास करें। इसके बाद पुनः एक से दो गिलास पानी पीकर उपरोक्त क्रम को दोहराएं। यह प्रक्रिया तब तक दोहराई जाए जब तक कि सफेद रंग का पानी निकलना आरंभ न हो जाए। प्रक्रिया के दौरान यदि मल त्याग की इच्छा हो तो तुरंत शौच के लिए जाएं।
शंख प्रक्षालन समाप्त होने के पश्चात् दो-तीन गिलास सादे गुनगुने पानी का सेवन करके कुछ समय विश्राम करें।
महत्वपूर्ण सावधानियाँ:
क्रिया समाप्ति के बाद ठंडे पानी से स्नान न करें; केवल गुनगुने पानी से स्नान करें तथा कपड़े पहनकर ही बाहर निकलें।
एक घंटे के भीतर हल्का भोजन लें, जिसमें 25-30 ग्राम शुद्ध घी मिला दलिया या खिचड़ी उपयुक्त रहती है।
24 घंटे तक दही, दूध एवं दूधजन्य पदार्थों का सेवन न करें।
क्रिया के बाद पर्याप्त विश्राम अनिवार्य है।
स्वास्थ्य लाभ:
नियमित अभ्यास से पाचन तंत्र की समग्र सफाई होती है। इससे सिरदर्द, नेत्र रोग, कान-नाक-गले की समस्याएँ, पायरिया, आंतों के सूजन एवं घाव, अपच जैसी समस्याओं में लाभ मिलता है। महिलाओं में ल्यूकोरिया, अनियमित मासिक धर्म तथा अन्य गर्भाशय संबंधी विकारों में भी सुधार देखा गया है।
आसन अभ्यास हेतु सामान्य निर्देश:
खाली पेट तथा सूर्योदय/सूर्यास्त के समय आसन करना उपयुक्त रहता है।
स्वच्छ, हवादार स्थान पर चटाई या साफ कंबल बिछाकर अभ्यास करें।
आसन समाप्ति के आधे घंटे बाद ही भोजन करें।
मासिक धर्म के दिनों में तथा प्रसव के पाँच माह तक महिलाओं को इस क्रिया से बचना चाहिए।
गंभीर रोग होने पर पूर्व चिकित्सकीय परामर्श अनिवार्य है।
प्रत्येक आसन के अंत में शवासन का अभ्यास अवश्य करें।
स्वास्थ्य ही सच्चा धन है।
— मीना अग्रवाल, नेचुरोपैथिक , आगरा

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Rajesh