वसई-विरार: वसई-विरार महापालिका क्षेत्र से एक बेहद चौंकाने वाली खबर सामने आई है। शिक्षा विभाग द्वारा क्षेत्र के 47 शिक्षण संस्थानों को अमान्य यानी अवैध घोषित कर दिया गया है। इस घोषणा के बाद से ही हज़ारों विद्यार्थियों और उनके पालकों की नींद उड़ गई है। सबसे अहम सवाल यह उठ रहा है कि जब प्रशासन इन संस्थानों को अमान्य करार दे चुका है, तो फिर इनमें नए दाखिले (एडमिशन) किस आधार पर दिए जा रहे हैं?
प्रशासनिक ढिलाई पर उठते गंभीर सवाल
स्थानीय नागरिकों और अभिभावकों का आरोप है कि केवल कागज़ों पर अमान्य घोषित कर देने भर से ज़िम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती। यदि यह सूची जारी की गई थी, तो संबंधित परिसरों के मुख्य द्वार पर चेतावनी नोटिस क्यों नहीं चिपकाए गए? प्रशासन द्वारा समय रहते तालाबंदी या सीलिंग की सख्त कार्रवाई क्यों अमल में नहीं लाई गई, ताकि मासूम बच्चों का भविष्य अधर में न लटके?
मासूम बच्चों का भविष्य दांव पर
सबसे बड़ा संकट उन परिवारों पर मंडरा रहा है जिन्होंने अनजाने में इन संस्थानों में दाखिला करा लिया है या जो कराने की योजना बना रहे हैं। यदि आगे चलकर इन संस्थानों पर पूर्ण प्रतिबंध लगता है, तो विद्यार्थियों के टीसी (स्थानांतरण प्रमाण पत्र), रिपोर्ट कार्ड और पूरे शैक्षणिक वर्ष की वैधता पर प्रश्नचिह्न लग जाएगा।
किसे मिल रहा है ढिलाई का फायदा?
कड़ा रुख न अपनाने के कारण यह शंका भी गहरा रही है कि कार्रवाई में हो रही देरी का सीधा लाभ अनधिकृत स्कूल संचालक उठा रहे हैं। बिना किसी भय के धड़ल्ले से एडमिशन फीस वसूली जा रही है और प्रशासन मूकदर्शक बना बैठा है।
अब ‘तृप्ति प्रमाण’ के माध्यम से अभिभावक प्रशासन से सीधी जवाबदेही मांग रहे हैं—आखिर इन 47 संस्थानों पर ठोस कदम कब उठाया जाएगा और विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य की गारंटी कौन लेगा?