मनोर के महाराजा गणपति के चरणों में पद्मश्री भिकल्या धिंड्या; तारपा के सुरों से गणेशोत्सव में बिखरा सांस्कृतिक रंग |

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पारंपरिक तारपा वादन और वारली संस्कृति के संरक्षण के लिए जीवन समर्पित; गणेश मंडल की ओर से किया गया सम्मान

मनोर। आदिवासी संस्कृति की समृद्ध परंपरा को संजोकर रखने वाले वरिष्ठ तारपा वादक पद्मश्री भिकल्या लाडक्या धिंड्या ने बुधवार को मनोर के महाराजा गणपति के दर्शन कर गणराय का आशीर्वाद लिया। उनके आगमन की जानकारी मिलते ही गणेश मंडल के पदाधिकारियों और श्रद्धालुओं ने उनका उत्साहपूर्वक स्वागत किया।

मनोर के महाराजा गणपति मंडल की ओर से आतिशबाजी कर सम्मान की शाल और पुष्पगुच्छ भेंट कर पद्मश्री भिकल्या धिंड्या का सम्मान किया गया।

150 वर्षों से चली आ रही तारपा वादन की परंपरा

पद्मश्री भिकल्या धिंड्या पालघर जिले के जव्हार तालुका स्थित वालवंडा गांव के निवासी हैं। उन्होंने अपना पूरा जीवन पारंपरिक तारपा वादन और वारली संस्कृति के संरक्षण के लिए समर्पित किया है।

उनके परिवार में पिछले 150 वर्षों से तारपा वादन की परंपरा चली आ रही है। उन्होंने महज 12 वर्ष की उम्र से इस पारंपरिक कला को सीखना शुरू किया था। इसके बाद आठ दशकों से अधिक समय तक उन्होंने तारपा वादन के माध्यम से आदिवासी संस्कृति की विरासत को आगे बढ़ाया।

2026 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित

तारपा वादन और आदिवासी संस्कृति के संरक्षण में उनके योगदान को देखते हुए 2026 में भिकल्या धिंड्या को पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

उनकी मौजूदगी से मनोर के महाराजा गणपति का गणेशोत्सव और भी सांस्कृतिक रंग में रंग गया। पारंपरिक तारपा वादन के माध्यम से आदिवासी संस्कृति की समृद्ध विरासत को संजोकर रखने वाले इस वरिष्ठ कलाकार की उपस्थिति से श्रद्धालुओं में भी उत्साह का माहौल देखने को मिला।

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