जौनपुर। “भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जिसकी सबसे बड़ी ताकत संविधान या चुनाव के साथ-साथ जनता का वह अटूट विश्वास है कि उसकी आवाज़ सुनी जाएगी। जब यह भरोसा कमजोर पड़ता है, तब लोकतंत्र की धड़कन संसद की चौखट से निकलकर सड़कों पर सुनाई देने लगती है। आंदोलन लोकतंत्र के शत्रु नहीं, बल्कि उसकी जीवित चेतना का प्रतीक हैं।” ये विचार पूर्वांचल विश्वविद्यालय के जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर व राजनीतिक विश्लेषक डॉ. सुनील कुमार ने व्यक्त किए हैं।
आंदोलनों का इतिहास और पिछला एक दशक
स्वतंत्रता संग्राम से लेकर जेपी आंदोलन, अन्ना आंदोलन और निर्भया आंदोलन तक का इतिहास गवाह है कि जनआंदोलनों ने हमेशा व्यवस्था को आईना दिखाया है। पिछले एक दशक में किसान आंदोलन, सीएए (CAA) विरोध, अग्निपथ योजना, पहलवानों का धरना, नीट परीक्षा विवाद और आरक्षण संबंधी प्रदर्शनों ने यही सवाल उठाया—क्या सत्ता और जनता के बीच सीधा संवाद कायम है?
किसान, छात्र और खिलाड़ियों का संघर्ष
- किसान आंदोलन: तीन कृषि कानूनों के खिलाफ लंबा चला यह संघर्ष साबित करता है कि यदि शुरुआत में ही संवाद और भरोसे का माहौल बनता, तो इतना लंबा टकराव टाला जा सकता था।
- छात्रों की पीड़ा: किसानों की तुलना में छात्रों के पास संघर्ष का समय सीमित होता है। एक परीक्षा रद्द होने या पेपर लीक होने से उनका पूरा भविष्य दांव पर लग जाता है। नीट और भर्ती परीक्षाओं के विवादों ने शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता की सख्त जरूरत को रेखांकित किया है।
- खिलाड़ियों का सम्मान: जंतर-मंतर पर अंतरराष्ट्रीय पदक विजेता पहलवानों का बैठना केवल खेल का मुद्दा नहीं, बल्कि संस्थाओं की विश्वसनीयता और नागरिकों के सम्मान से जुड़ा प्रश्न है।
लोकतंत्र में असहमति का सम्मान और अटल नीति से सीख
अटल बिहारी वाजपेयी की राजनीति का उदाहरण देते हुए डॉ. सुनील कुमार ने कहा कि वैचारिक मतभेदों के बावजूद विपक्ष का सम्मान करना परिपक्व लोकतंत्र की पहचान है। “मतभेद हो सकते हैं, मनभेद नहीं”—यह दृष्टिकोण आज के राजनीतिक ध्रुवीकरण के दौर में सबसे ज्यादा प्रासंगिक है। सरकार को हर आंदोलन को साजिश मानने के बजाय सामाजिक पीड़ा समझना चाहिए, वहीं विपक्ष को भी केवल राजनीतिक लाभ उठाने के बजाय रचनात्मक भूमिका निभानी चाहिए।
निष्कर्ष: सड़क और संसद प्रतिद्वंद्वी नहीं, एक-दूसरे के पूरक
संसद नीतियां बनाती है और सड़क समाज की नब्ज बताती है। जब दोनों के बीच संवाद टूटता है, तब असंतोष जन्म लेता है। लोकतंत्र की असली जीत आंदोलन को दबाने में नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने में है जहाँ आंदोलन की आवश्यकता ही न पड़े।
(विशेष आलेख: डॉ. सुनील कुमार, राजनीतिक विश्लेषक एवं असिस्टेंट प्रोफेसर, वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर)
(संवाददाता: शंभू, जौनपुर)