काशी में जीवन और अध्यात्म का अद्भुत संगम
वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय जौनपुर के जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सुनील कुमार के अनुसार, काशी का सावन केवल एक पर्व नहीं बल्कि जीवन और अध्यात्म का अनूठा उत्सव है। सावन के अंतिम सोमवार और काशी का मिलन अपने आप में एक अलौकिक अनुभूति प्रस्तुत करता है। गंगा के घाटों से लेकर बाबा विश्वनाथ के भव्य धाम तक पूरी काशी ‘हर-हर महादेव’ के जयघोष से शिवमय नजर आती है।
‘भगवान शिव कैलाश के गंभीर महादेव भी हैं और बनारस के अपने बाबा भी’
काशी की मूल विशेषता यही है कि यहां अध्यात्म कभी बोझिल नहीं लगता। बनारस में भक्त भगवान शिव से बिना किसी संकोच के शिकायत भी करते हैं, मनुहार भी करते हैं और अपने सुख-दुःख की पूरी गठरी उनके समक्ष खोल देते हैं। भीमेश्वर महादेव (काशी करवट), त्रिदेव मंदिर, संकटमोचन मंदिर और भोर से पहले बाबा विश्वनाथ की मंगला आरती में शामिल होकर भक्त अद्भुत शांति का अनुभव करते हैं।
पूजा के बाद बतरस और कचौड़ी-चाय की बनारसी परंपरा
काशी की सहजता यही है कि यहां पूजा के बाद प्रसाद, प्रसाद के बाद अड़ियों पर बतरस और फिर मित्रों के साथ कचौड़ी-चाय का दौर चलता है। रक्षाबंधन के समापन के बाद अब धार्मिक परंपराएं देवपूजन और भगवान नारायण (श्रीहरि) की आराधना की ओर अग्रसर होंगी। शिव से विष्णु तक, गंगा से गलियों तक—काशी में पर्व समाप्त नहीं होते, बल्कि एक-दूसरे में घुलते चले जाते हैं।
(रिपोर्ट: शम्भू विश्वकर्मा, तृप्ति प्रमाण)