संवाददाता : चुन्नू श्रीवास्तव तृप्ति प्रमाण
पालघर। महाराष्ट्र के पालघर और आसपास के इलाकों में बचपन एक खतरनाक दलदल में फंसता जा रहा है। स्कूल जाने की उम्र में जब बच्चों के हाथों में किताबें होनी चाहिए, तब वे सस्ते केमिकल जैसे व्हाइटनर और सलूशन का नशा करने लगे हैं। राज्य सरकार और प्रशासन की ओर से चलाए जा रहे अभियानों के बावजूद गरीब परिवारों के बच्चे, विशेषकर भीख मांगने वाले और कबाड़ बीनने वाले नौनिहाल, नशे की चपेट में आ रहे हैं।
सस्ते केमिकल का खतरनाक शौक
पालघर, बोईसर, डहाणू, वानगांव, वसई-विरार और नालासोपारा जैसे क्षेत्रों में छोटे बच्चे खुलेआम व्हाइटनर और सलूशन का सेवन करते देखे जा सकते हैं। ये बच्चे साइकिल और स्टेशनरी की दुकानों से ये केमिकल खरीदते हैं। जानकारी के अनुसार, वे इन पदार्थों को कपड़े या पॉलीथिन में डालकर जोर-जोर से सूंघते हैं। इसके दुष्प्रभाव से वे घंटों तक किसी कोने में बेसुध पड़े रहते हैं।
नशे की तलाश में अपराध की ओर
यह आदत न केवल बच्चों के स्वास्थ्य के लिए घातक है, बल्कि उन्हें अपराध की दुनिया में भी धकेल रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जब इन बच्चों के पास नशा खरीदने के लिए पैसे नहीं होते, तो वे चोरी, छीना-झपटी और अन्य आपराधिक गतिविधियों का सहारा लेते हैं, जिससे क्षेत्र में असुरक्षा का माहौल बन रहा है।
पुलिस का दावा और जमीनी हकीकत
बोईसर पुलिस द्वारा स्कूली बच्चों और युवाओं में नशे के खिलाफ जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। साथ ही नशे के अवैध धंधों पर नियमित कार्रवाई भी की जाती है, लेकिन इसके बावजूद जमीनी स्तर पर हालात पूरी तरह से नियंत्रण में नहीं आ पा रहे हैं।
सामाजिक संगठनों की चिंता
इस गंभीर मुद्दे पर नमो नमो मोर्चा भारत के राष्ट्रीय अध्यक्ष सत्यप्रकाश सिंह ने चिंता व्यक्त की है। उनका मानना है कि आर्थिक रूप से कमजोर बच्चे नशे की लत के कारण अपराध की ओर अग्रसर होते हैं। उन्होंने इस समस्या से निपटने के लिए परिवार, समाज और सामाजिक संगठनों की सक्रिय भागीदारी की आवश्यकता पर बल दिया।
स्वास्थ्य पर पड़ रहा घातक प्रभाव
चिकित्सकीय दृष्टिकोण से यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। डॉ. अमित यादव के अनुसार, सलूशन और इंक रिमूवर जैसे पदार्थों का सेवन बच्चों के शरीर के लिए अत्यंत हानिकारक है। पहली बार में अधिक मात्रा में केमिकल सूंघने से हृदय गति अनियमित हो सकती है और ब्लड प्रेशर अचानक गिर सकता है, जिससे मौत का खतरा भी होता है। लंबे समय तक इससे ‘यूफोरिक इफेक्ट’ लेने वाले बच्चों में भविष्य में कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
प्रशासन और समाज को समय रहते ठोस कदम उठाने होंगे, अन्यथा यह समस्या भविष्य में समाज के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती है।