पुणे से 150 वारकरी विशेष रूप से पहुंचे, भजन-कीर्तन और पारंपरिक वेशभूषा के साथ निकली गणपति विसर्जन शोभायात्रा
विरार पूर्व।
विरार पूर्व के गोपचरपाड़ा में ‘जय गणेश मित्र मंडल सार्वजनिक गणेशोत्सव’ पिछले 42 वर्षों से श्रद्धा और परंपरा के साथ गणेशोत्सव मना रहा है। मंडल की स्थापना वर्ष 1985 में हुई थी। इस वर्ष भी गणपति बप्पा की विसर्जन शोभायात्रा में महाराष्ट्र की पारंपरिक वारकरी संस्कृति के साथ दक्षिण भारतीय संस्कृति की झलक देखने को मिली।
मंडल के अध्यक्ष रोहन सावंत के नेतृत्व में आयोजित विसर्जन शोभायात्रा में पुणे से करीब 150 वारकरी विशेष रूप से शामिल हुए। ढोल-ताशे, भजन-कीर्तन और पारंपरिक वेशभूषा के साथ निकली शोभायात्रा ने श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित किया।
शोभायात्रा के पूरे मार्ग पर भक्तिमय वातावरण बना रहा। गोपचरपाड़ा और आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु इसमें शामिल हुए और गणपति बप्पा को भावपूर्ण विदाई दी।
वारकरी परंपरा और दक्षिण भारतीय संस्कृति का संगम
मंडल के पदाधिकारियों के अनुसार, शासन के निर्णय के अनुरूप इस वर्ष विसर्जन शोभायात्रा के माध्यम से महाराष्ट्र की पारंपरिक वारकरी परंपरा और दक्षिण भारतीय संस्कृति के महत्व को प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया।
आयोजकों के मुताबिक, इस आयोजन का उद्देश्य केवल धार्मिक उत्सव तक सीमित नहीं था, बल्कि नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति, पारंपरिक विरासत और सामाजिक एकता से परिचित कराने का संदेश भी देना था।
पुणे से पहुंचे करीब 150 वारकरियों की सहभागिता ने शोभायात्रा को विशेष रूप दिया। पारंपरिक भजन-कीर्तन और ढोल-ताशों की गूंज के बीच श्रद्धालु गणपति बप्पा की भक्ति में शामिल नजर आए।
भावपूर्ण माहौल में ‘गोपचरपाड़ा के राजा’ को विदाई
‘विरार गोपचरपाड़ा के राजा’ के नाम से प्रसिद्ध गणपति बप्पा को श्रद्धालुओं ने भावपूर्ण माहौल में विदाई दी। शोभायात्रा में बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिकों की सहभागिता रही।
42 वर्षों से चली आ रही यह परंपरा इस वर्ष भी श्रद्धा, सांस्कृतिक विविधता और सामाजिक संदेश के साथ आगे बढ़ी। गणेश विसर्जन शोभायात्रा में वारकरी परंपरा और दक्षिण भारतीय संस्कृति की प्रस्तुति ने आयोजन को एक अलग सांस्कृतिक पहचान दी।
राष्ट्रीय हिंदी साप्ताहिक ‘तृप्ति प्रमाण’




