चेन्नई/झारखंड: तकनीक और इंसानियत के संगम ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि चमत्कार कहीं भी हो सकते हैं। चेन्नई की सड़कों पर भटक रहे एक मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को 16 साल बाद उसके परिवार से मिलाने की यह कहानी आजकल चर्चा का विष बनी हुई है।
16 साल पहले छोड़ा था घर, सड़कों पर भटकते रहे
यह घटना झारखंड के छत्रा जिले के बेंटी गाँव की है। पारिवारिक विवाद के चलते रमेश गंजू ने 16 साल पहले अपना घर छोड़ दिया था। पत्नी मुन्ना देवी और बेटों ने खूब खोजबीन की, लेकिन कोई सुराग नहीं मिला। धीरे-धीरे रमेश गंभीर मानसिक बीमारी और नशे की लत का शिकार होकर चेन्नई की सड़कों पर आ गए।
NGO की करुणा ने बदली कहानी
रमेश की जिंदगी में रोशनी तब आई जब चेन्नई की संस्था ‘उदवुम करंगल’ (जिसकी स्थापना एस. विद्यासागर ने की थी) के समाजसेवियों—मोहन, जैकब और श्रीनिवास राव ने उन्हें सड़क पर देखा। उन्हें तुरंत एक मानसिक पुनर्वास केंद्र में भर्ती कराया गया। इलाज के दौरान रमेश को अपनी जड़ों की कुछ झलकियां याद आने लगीं।
WhatsApp के जरिए जुड़ा बिखरा हुआ परिवार
समाजसेवियों ने रमेश की तस्वीर और जानकारी WhatsApp ग्रुप्स में शेयर की। यह डिजिटल संदेश सैकड़ों किलोमीटर दूर झारखंड के कल्याणपुर में एक किराना दुकान तक पहुँचा। दुकानदार ने रमेश को पहचान लिया और तुरंत उसकी पत्नी को सूचना दी। हैरानी की बात यह है कि रमेश का बेटा नागेश्वर भी काम की तलाश में चेन्नई के बाहरी इलाके में ही था। महज कुछ घंटों के भीतर पिता और पुत्र का मिलन हो गया।
‘ऑल इन्क्लूसिव इंटेलिजेंस’ की सजीव मिसाल
यह घटना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘ऑल इन्क्लूसिव इंटेलिजेंस’ (सर्वसमावेशी बुद्धिमत्ता) के विजन को चरितार्थ करती है। आज जब डिजिटल दुनिया रील्स और ट्रोलिंग तक सीमित है, यह कहानी बताती है कि तकनीक का असली उपयोग समाज के अंतिम व्यक्ति की मदद और मानव गरिमा की रक्षा में होना चाहिए।