वसई-विरार महानगरपालिका की महासभा में 52 ग्राम पंचायत क्षेत्रों की जल आपूर्ति का विषय एक बार फिर चर्चा में आया। विपक्षी दल के प्रतिनिधियों ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर प्रश्न चिह्न लगाते हुए कहा कि ग्रामीण आबादी के साथ लंबे समय से न्यायपूर्ण व्यवहार नहीं हो पा रहा है।
वर्ष 2004 में आरंभ हुई इस जल वितरण योजना में 69 गांवों को शामिल किया गया था। योजना के तहत जल भंडारण टंकियों के जीर्णोद्धार का प्रस्ताव जब सभा पटल पर रखा गया, तो चर्चा गर्मा गई। विपक्ष के प्रतिनिधि मनोज पाटील ने बताया कि 2013 में टंकियों का निर्माण कार्य पूर्ण हो गया था, किंतु जल उपलब्धता के तकनीकी कारणों का हवाला देकर इनका परीक्षण तक नहीं किया जा सका। उनके अनुसार, यदि दिसंबर 2024 से पहले नल कनेक्शन की व्यवस्था कर दी जाती, तो न्यायालय की प्रक्रियाओं में फंसे बिना हजारों परिवारों तक पेयजल पहुंच सकता था।
ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए पाटील ने याद दिलाया कि जब शहरी क्षेत्र में जल संकट गहराया हुआ था, तब इन ग्रामीण इलाकों ने अपने जल स्रोतों से शहर की आवश्यकता पूरी करने में सहयोग किया था। वर्तमान में महानगरपालिका के पास 415 एमएलडी से अधिक जल उपलब्ध है, फिर भी ग्रामीण क्षेत्रों को उनके हिस्से का जल नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने उल्लेख किया कि 100 एमएलडी क्षमता की योजना में ग्रामों को 21 एमएलडी जल उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया गया था, जो अब तक कार्यान्वित नहीं हो सका है।
चर्चा के दौरान एक महत्वपूर्ण पहलू सामने आया। पाटील ने बताया कि महाराष्ट्र जीवन प्राधिकरण के तकनीकी अधिकारी राजनीतिक प्रभाव के कारण निर्णय लेने में असमर्थ महसूस कर रहे थे। स्थिति इतनी गंभीर थी कि अधिकारी कार्यालय में मिलने से भी बचने लगे थे। उन्होंने प्रशासन से अनुरोध किया कि जब तक स्थायी समाधान नहीं निकाला जाता, तब तक ग्रामीणों को सामुदायिक जल वितरण केंद्रों से जल लेने की अनुमति प्रदान की जाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल प्रस्ताव पारित करने से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि तत्काल प्रभाव से टंकियों को चालू कर ग्रामीण इलाकों तक जल पहुंचाना आवश्यक है।
प्रशासन की ओर से अभी तक इस विषय पर विस्तृत प्रतिक्रिया प्राप्त नहीं हो सकी है। जांच और कार्यवाही प्रक्रिया जारी है।
नमस्कार, आप देख रहे हैं तृप्ति प्रमाण। मैं हूं राजेश कोरी, ब्यूरो चीफ़।