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मानसून आते ही टापू क्यों बन जाता है वसई-विरार? जानिए घंटों नहीं, बल्कि दिनों तक पानी जमा रहने की असली वजह |

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वसई: मुंबई से सटे और बेहद तेजी से विकसित हो रहे वसई-विरार शहर में हर साल मानसून का आना स्थानीय लोगों के लिए किसी बड़ी आफत से कम नहीं होता। हर बरसात में जलभराव और बाढ़ जैसी विकट स्थिति अब यहाँ की नियति बन चुकी है। लेकिन आखिर ऐसा क्यों होता है? विशेषज्ञों की मानें तो इस बदहाली के पीछे प्रकृति से ज्यादा इंसानी गलतियाँ जिम्मेदार हैं। अनियोजित शहरीकरण, अंधाधुंध अवैध निर्माण, पानी सोखने वाली प्राकृतिक जमीनों का खात्मा और लचर ड्रेनेज सिस्टम ने मिलकर इस खूबसूरत शहर को हर मानसून में डूबने के लिए छोड़ दिया है। नतीजतन, जरा सी भारी बारिश में यहाँ हफ्तों जनजीवन ठप रहता है।

भौगोलिक बनावट: समुद्र तल से नीचे बसा है शहर

लगभग 380 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले वसई-विरार की भौगोलिक स्थिति ही कुछ ऐसी है कि यह आसानी से बाढ़ की चपेट में आ जाता है। इस शहर का एक बड़ा हिस्सा समुद्र तल (Sea Level) से काफी नीचे है। इसके पश्चिम दिशा में अरब सागर है और पूर्व में तुंगारेश्वर की ऊँची पहाड़ियाँ स्थित हैं। मॉनसून के दौरान पहाड़ियों से बहकर आने वाला पानी समुद्र की तरफ बढ़ता है, लेकिन निचला इलाका होने के कारण वह बीच में ही थम जाता है। स्थिति तब और बदतर हो जाती है जब भारी बारिश के साथ-साथ समुद्र में हाई टाइड (ऊंची ज्वार) आ जाए। ऐसी स्थिति में समुद्र का पानी उल्टे शहर की तरफ भागता है, जिससे सड़कें, रेल की पटरियाँ और रिहायशी सोसायटियाँ जलमग्न हो जाती हैं।

कंक्रीट का जंगल और अनियंत्रित विकास

पिछले डेढ़ दशक में वसई-विरार की आबादी में अप्रत्याशित उछाल आया है। मुंबई में घरों की आसमान छूती कीमतों के कारण मध्यमवर्गीय परिवारों और औद्योगिक विस्तार की वजह से कामकाजी लोगों ने इस तरफ का रुख किया। आबादी तो बढ़ी, लेकिन उस अनुपात में ड्रेनेज सिस्टम और बुनियादी ढाँचे का विकास नहीं हो सका। जहाँ कभी बड़े-बड़े खेत, नमक के मैदान (मिठागर) और दलदली जमीनें हुआ करती थीं (जो प्राकृतिक रूप से स्पंज की तरह बारिश का पानी सोख लेती थीं), आज वहाँ मिट्टी का भराव करके गगनचुंबी इमारतें और पक्की सड़कें बना दी गई हैं। जमीन कंक्रीट की हो चुकी है, जिससे पानी के जमीन में रिसने का रास्ता पूरी तरह बंद हो गया है।

प्राकृतिक जलमार्गों पर कब्जा और नाले जाम

बाढ़ की एक और बड़ी वजह प्राकृतिक नालों और खाड़ियों के प्रवाह का रुकना है। पहले बारिश का पानी इन्हीं प्राकृतिक रास्तों से होते हुए आसानी से समुद्र में समा जाता था। मगर बीते वर्षों में इन जलमार्गों पर बड़े पैमाने पर भू-माफियाओं द्वारा अतिक्रमण और अवैध निर्माण किए गए। कई जगहों पर चौड़े नालों को दबाकर वहाँ छोटे सीमेंट के पाइप डाल दिए गए, जो भारी बारिश का दबाव झेलने में पूरी तरह नाकाम साबित होते हैं। रही-सही कसर नालों में फेंका जाने वाला प्लास्टिक, घरेलू कचरा और कंस्ट्रक्शन वेस्ट पूरी कर देता है। मॉनसून से पहले करोड़ों खर्च कर होने वाली नाला सफाई का सच पहली बारिश में ही सामने आ जाता है, क्योंकि नालों से निकाली गई गाद (सिल्ट) को अक्सर किनारे ही छोड़ दिया जाता है, जो दोबारा बहकर नाले को चोक कर देती है।

लाइफलाइन रेलवे पर सीधा प्रहार

इस जलभराव का सबसे घातक असर पश्चिम रेलवे (Western Railway) की सेवाओं पर पड़ता है। नालासोपारा और वसई रोड रेलवे स्टेशनों के पास पटरियाँ पानी में डूब जाती हैं, जिससे मुंबई की लाइफलाइन कही जाने वाली लोकल ट्रेनें थम जाती हैं। बताया जाता है कि रेलवे की पांचवीं और छठी लाइन के निर्माण कार्य के दौरान कुछ जलभराव वाले क्षेत्रों में की गई मिट्टी की फिलिंग ने भी पानी के प्राकृतिक बहाव को नुकसान पहुँचाया है। जैसे ही ट्रेनें बंद होती हैं, वसई-विरार का मुंबई से संपर्क कट जाता है और लाखों नौकरीपेशा लोग जहाँ-तहाँ फंस जाते हैं।

क्या है इस गंभीर समस्या का स्थायी समाधान?

जानकारों का स्पष्ट कहना है कि केवल हर साल नालों की सतही सफाई करने से यह समस्या कभी खत्म नहीं होगी। इसके लिए प्रशासन को कड़े और दूरगामी कदम उठाने होंगे:

  • प्राकृतिक नालों और खाड़ियों को हर प्रकार के अतिक्रमण से तत्काल मुक्त कराया जाए।
  • बचे हुए नमक के खेतों (मिठागरों) और दलदली जमीनों को ‘नो डेवलपमेंट ज़ोन’ घोषित कर संरक्षित किया जाए।
  • आधुनिक और वैज्ञानिक तकनीकों पर आधारित नई ड्रेनेज प्रणाली विकसित की जाए।
  • रेलवे और स्थानीय महानगरपालिका के बीच बेहतर तालमेल बिठाकर जल निकासी के बंद पड़े रास्तों को खोला जाए।

जब तक इस दिशा में कोई ठोस और मास्टर प्लान बनाकर काम नहीं किया जाएगा, तब तक वसई-विरार के नागरिकों को हर साल इसी तरह मानसून की आफत झेलनी पड़ेगी।

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Rajesh