चेतावनी, मोर्चे और जनआक्रोश सभा के बावजूद काम जारी; आक्रोशित स्थानीय लोगों ने जलसमाधि आंदोलन के जरिए सरकार को दी चुनौती
पालघर (प्रतिनिधि): विकास के नाम पर यदि स्थानीय लोगों के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा किया जा रहा है, तो आखिर यह विकास किसके लिए है? यह तीखा सवाल अब पालघर के समुद्र तट से उठने लगा है। वाढवण बंदरगाह परियोजना के खिलाफ चल रहा संघर्ष अब और आक्रामक हो गया है। स्थानीय मछुआरों और भूमिपुत्रों ने सीधे समुद्र के पानी में उतरकर जलसमाधि आंदोलन शुरू कर दिया है। सरकार और प्रशासन को बार-बार चेतावनी देने के बावजूद बंदरगाह के प्रस्तावित स्थल पर भराव डालने का काम दोबारा शुरू होने से स्थानीय लोगों का गुस्सा फूट पड़ा है।
दो दिन पहले ही वरोर में आयोजित जनआक्रोश सभा में हजारों नागरिकों ने एकजुट होकर वाढवण बंदरगाह सहित प्रस्तावित परियोजनाओं का विरोध किया था। सभा में बंदरगाह के लिए चल रहे कार्यों और समुद्र तट पर किए जा रहे भराव को तत्काल रोकने की मांग भी की गई थी। लेकिन स्थानीय लोगों का आरोप है कि जनभावनाओं को गंभीरता से लेने के बजाय प्रशासन ने दोबारा काम शुरू कर दिया। इससे आक्रोशित नागरिकों ने समुद्र तट पर पत्थर लाने वाले ट्रकों को रोक दिया और समुद्र के पानी में उतरकर आंदोलन शुरू कर दिया।
महिला, युवा और बच्चे भी आंदोलन में शामिल
इस आंदोलन की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें महिलाओं, युवाओं और बच्चों की भी भागीदारी दिखाई दे रही है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि पारंपरिक मछली पकड़ने का व्यवसाय, समुद्री जैव विविधता, खेती, स्थानीय रोजगार और पीढ़ियों से चली आ रही जीवनशैली खतरे में पड़ सकती है। प्रदर्शनकारियों का दावा है कि बंदरगाह के निर्माण से हजारों मछुआरा परिवारों की आजीविका प्रभावित होने की आशंका है।
वरोर में आयोजित जनआक्रोश सभा में हजारों की संख्या में नागरिक शामिल हुए थे। विभिन्न राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और मछुआरा संगठनों ने भी इस संघर्ष को अपना समर्थन दिया। लेकिन इतने बड़े जनआक्रोश के बावजूद यदि परियोजना का काम जारी रहता है, तो लोकतंत्र में जनता की आवाज और जनमत का आखिर कितना महत्व है? यह सवाल अब उठने लगा है।
पुलिस बल के इस्तेमाल का प्रदर्शनकारियों ने लगाया आरोप
परियोजना का विरोध कर रहे स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया है कि पुलिस बल का इस्तेमाल कर जनता के विरोध के बावजूद काम को आगे बढ़ाया जा रहा है। वहीं, प्रदर्शनकारियों ने सवाल उठाया है कि विकास के नाम पर यदि स्थानीय लोगों की जमीन, समुद्र और आजीविका प्रभावित होती है, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
अब पीछे हटने का सवाल नहीं; संघर्ष और तेज होने के संकेत!
प्रदर्शनकारियों ने स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा है कि जब तक वाढवण बंदरगाह परियोजना रद्द नहीं होती, तब तक आंदोलन नहीं रुकेगा। समुद्र में उतरकर दिया गया यह संदेश केवल आंदोलन का अगला चरण नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों के बढ़ते असंतोष का प्रतीक बनता जा रहा है।
पालघर जिले को विकास चाहिए, लेकिन स्थानीय लोगों को विस्थापित करके, उनके पारंपरिक रोजगार की बलि देकर और पर्यावरण की कीमत चुकाकर नहीं। स्थानीय लोगों में यह भावना लगातार मजबूत होती जा रही है।
ऐसे में अब सरकार के लिए केवल बंदरगाह से होने वाले आर्थिक लाभ का हिसाब देना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि स्थानीय लोगों की आपत्तियों और उनके भविष्य से जुड़े गंभीर सवालों का जवाब देना भी जरूरी हो गया है।


