आदिवासी परिवारों की रोजी-रोटी पर भी मंडराया संकट; व्यापारियों ने बंद किए घास और पावली के तौल कांटे
पालघर | तृप्ति प्रमाण
पालघर जिले से हरे और सूखे चारे को दूसरे जिलों तथा राज्यों में ले जाने पर प्रशासन की ओर से लगाए गए प्रतिबंध का असर अब स्थानीय व्यापारियों के साथ-साथ आदिवासी किसानों और ग्रामीण श्रमिकों की आजीविका पर भी पड़ने लगा है। प्रतिबंध के विरोध में चारा कारोबार से जुड़े व्यापारियों ने घास और पावली की खरीद-बिक्री के लिए संचालित तौल कांटे बंद कर दिए हैं। इससे घास बेचकर परिवार का भरण-पोषण करने वाले आदिवासी किसानों और ग्रामीण श्रमिकों के सामने आर्थिक संकट खड़ा होने की आशंका है।
इस समस्या को लेकर चारा व्यापारियों ने वानगांव में बैठक आयोजित की। बैठक में पूर्व विधान परिषद सदस्य आनंद भाई ठाकुर प्रमुख रूप से उपस्थित रहे। उन्होंने व्यापारियों की समस्याएं सुनीं और इस मामले का जल्द समाधान निकालने का आश्वासन दिया।
अक्टूबर-नवंबर में होती है घास की कटाई
पालघर जिले में बड़े पैमाने पर घास और पावली का उत्पादन होता है। हर साल अक्टूबर महीने में घास की कटाई शुरू होती है। इस दौरान आदिवासी किसान, ग्रामीण और खेतों में मजदूरी करने वाले श्रमिक घास काटकर बाजार में बेचते हैं। इससे होने वाली आमदनी उनके परिवारों की आजीविका का महत्वपूर्ण साधन है।
घास कटाई का मौसम समाप्त होने के बाद बड़ी संख्या में ग्रामीण श्रमिक रोजगार की तलाश में दूसरे क्षेत्रों का रुख करते हैं। ऐसे में अक्टूबर और नवंबर का समय उनके लिए आर्थिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। लेकिन चारे के परिवहन पर प्रतिबंध के कारण इस बार उनकी कमाई प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है।
400 व्यापारियों का कारोबार प्रभावित
पालघर जिले में करीब 400 व्यापारी घास और पावली के कारोबार से जुड़े हुए हैं। यहां से चारा मुंबई और आसपास के क्षेत्रों में स्थित पशुशालाओं के साथ-साथ गुजरात के विभिन्न इलाकों में भेजा जाता है। प्रशासन के प्रतिबंध के चलते बाहरी बाजारों में इसकी आपूर्ति बाधित हुई है। इसके परिणामस्वरूप व्यापारियों ने खरीद-बिक्री बंद कर अपने तौल कांटे भी बंद कर दिए हैं।
व्यापारियों का कहना है कि इस फैसले का असर केवल उनके व्यवसाय तक सीमित नहीं है, बल्कि घास बेचकर आजीविका चलाने वाले हजारों ग्रामीण और आदिवासी परिवारों की आर्थिक स्थिति पर भी पड़ रहा है।
पशुपालकों के साथ आदिवासी परिवारों के हितों का भी ध्यान रखने की मांग
चारा व्यवसायी ब्रिजेश ठाकुर ने कहा कि पशुधन के लिए जिले में चारे की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखना जरूरी है। हालांकि, इसके साथ उन आदिवासी किसानों, मजदूरों और ग्रामीण परिवारों के हितों की अनदेखी भी नहीं की जानी चाहिए, जिनकी आजीविका घास की बिक्री पर निर्भर है। उन्होंने प्रशासन से ऐसा व्यावहारिक विकल्प निकालने की मांग की, जिससे पशुपालकों को चारा उपलब्ध होता रहे और कारोबार से जुड़े लोगों का रोजगार भी प्रभावित न हो।
वहीं, चारा व्यापारी रमेश ठाकुर ने बताया कि पालघर जिले में लगभग 400 व्यापारी इस व्यवसाय से जुड़े हैं। अक्टूबर में काटी गई घास को पशुओं के चारे के रूप में सालभर इस्तेमाल करने के लिए सुरक्षित रखा जाता है। इसके बाद अधिकांश श्रमिक दूसरे क्षेत्रों में रोजगार की तलाश में चले जाते हैं। ऐसे महत्वपूर्ण समय में खरीद-बिक्री बंद होने से पूरे कारोबार पर संकट आ गया है।
व्यापारियों ने प्रशासन से प्रतिबंध के मुद्दे पर पुनर्विचार करने और चारे के परिवहन एवं बिक्री के लिए उचित व्यवस्था बनाने की मांग की है। उनका कहना है कि ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे पशुपालकों को चारा मिलता रहे और आदिवासी परिवारों तथा चारा कारोबारियों की आजीविका भी सुरक्षित रह सके।


